संतुलित है भारत का रुख

कश्मीर समस्या की बाबत सेना प्रमुख जनरल रावत के ताजा बयान की अहमियत जाहिर है। कोई साल भर पहले घाटी में सेना ने पहले से अधिक सख्त रुख अख्तिया...

कश्मीर समस्या की बाबत सेना प्रमुख जनरल रावत के ताजा बयान की अहमियत जाहिर है। कोई साल भर पहले घाटी में सेना ने पहले से अधिक सख्त रुख अख्तियार किया था। कश्मीर समस्या की बाबत सेना प्रमुख जनरल रावत के ताजा बयान की अहमियत जाहिर है। कोई साल भर पहले घाटी में सेना ने पहले से अधिक सख्त रुख अख्तियार किया था। लेकिन अब सेना प्रमुख ने ‘राजनीतिक-सैन्य’ रुख अपनाने की वकालत की है। साफ है कि वे अब राजनीतिक कदम को भी जरूरी मानते हैं। यों कश्मीर समस्या का राजनीतिक समाधान तलाशने की पैरवी करने वालों की कमी नहीं है, पर सेनाध्यक्ष का ऐसा कहना कहीं ज्यादा मायने रखता है। क्या जनरल रावत को भी अब यह अहसास हो रहा है कि वहां सेना पर निर्भर रहना काफी नहीं है, कुछ और भी किया जाना चाहिए? एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि राजनीतिक पहल और अन्य सभी पहलें साथ-साथ चलनी चाहिए और हम सभी अगर तालमेल के साथ काम करें तभी कश्मीर में स्थायी शांति ला सकते हैं। यह निष्कर्ष केवल सेना प्रमुख का नहीं है। सरकार को भी आखिरकार कश्मीर में स्थायी शांति के लिए राजनीतिक पहल की जरूरत महसूस हुई और इसीलिए पिछले साल अक्तूबर में आइबी के पूर्व प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को केंद्र का विशेष प्रतिनिधि नियुक्त कर उन्हें जम्मू-कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले विभिन्न पक्षों या घटकों से बातचीत का जिम्मा सौंपा गया। अलबत्ता यह साफ नहीं है कि क्या उन्हें हुर्रियत से भी बातचीत की जिम्मेदारी या छूट दी गई है। जहां तक सेना का सवाल है, उसने भी हाल के महीनों में अपने स्तर पर घाटी के लोगों तक पहुंच बनाने की कोशिशें की हैं। सेना की निगरानी और सतत प्रयासों के चलते आतंकवादी गुटों के जाल में पड़ जाने वाले कई युवक समाज की मुख्यधारा और अपने परिवार में लौट आए। इस तरह की कोशिशें इसी तरफ इशारा करती हैं कि सेना सिर्फ आतंकियों से लोहा लेने, आतंकी साजिशों को नाकाम करने और घुसपैठ रोकने में ही सक्षम नहीं है, वह घाटी के लोगों का भरोसा जीतने में भी अपनी कुशलता साबित कर सकती है, बशर्ते इस संतुलित दृष्टि से काम किया जाए कि सैन्य बल प्रयोग के साथ-साथ राजनीतिक पहल भी जरूरी है। जैसा कि सेना प्रमुख ने कहा है कि ‘हम यथास्थितिवादी नहीं हो सकते।’ शायद उनके कहने का आशय यह होगा कि आतंकवाद से कश्मीर के त्रस्त रहने को उसकी नियति नहीं मान लिया जाना चाहिए। यथास्थिति खत्म करने के लिए उन्होंने पाकिस्तान पर यह दबाव बनाने की भी वकालत की कि वह सीमापार से घुसपैठ कराना बंद करे। जनरल रावत मानते हैं कि इस दिशा में काफी कुछ किए जाने की गुंजाइश है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया सख्ती से भी यह जाहिर है। पर जहां तक वर्तमान वस्तुस्थिति की बात है, भले ही दुनिया को दिखाने और ट्रंप का गुस्ता शांत करने के लिए पाकिस्तान ने हाफिज सईद और उसके संगठनों के खिलाफ कुछ कदम उठाए हों, सीमापार से घुसपैठ और संघर्ष विराम समझौते के उल्लंघन का सिलसिला बदस्तूर जारी है। यही नहीं, पिछले बरसों की तुलना में इसमें और तेजी ही आई है। इसके चलते जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांवों के लोग न खेती कर पा रहे हैं न अपने घरों में सुरक्षित रह पा रहे हैं। उन्हें आए दिन अपने लिए सुरक्षित ठिकाने की तलाश में भटकना पड़ता है। भारतीय सैनिकों ने संघर्ष विराम उल्लंघन की कोशिशों का लगातार मुंहतोड़ जवाब दिया है और इसके फलस्वरूप पाकिस्तान की हताशा साफ लक्षित की जा सकती है। कश्मीर में घुसपैठ कराने और संघर्ष विराम उल्लंघन के वाकये निरंतर जारी हैं। पर भारतीय सैनिकों की मुस्तैदी के कारण इस तरह की कारस्तानियों से पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं हो पा रहा है। खबर है कि सोमवार को भारतीय सैनिकों और सीमापार से घुसपैठ कर रहे आतंकवादियों के बीच हुई गोलीबारी में पांच संदिग्ध आतंकी मारे गए। यही नहीं, इसी रोज भारतीय सैनिकों के साथ हुए टकराव में पाकिस्तान को अपनेचार सैनिक भी खोने पड़े। जब भी इस तरह की घटनाएं होती हैं, दोनों तरफ से एक दूसरे पर संघर्ष विराम समझौते के उल्लंघन के आरोप लगाए जाते हैं। पर सवाल यह है कि अगर पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर शांति चाहता है तो वह खुद घुसपैठ का सिलसिला क्यों नहीं बंद करता, जिसे वह भारत की तुलना में ज्यादा आसानी से कर सकता है!

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