अभी खरीदी का त्योहार चल रहा है, बहुत से किसान नया ट्रेक्टर खरीदने के सोच बना रहे होंगे ,परन्तु मशीनीकरण के नाम पर ट्रेक्टर खरीदना किसानो को कर्ज के तले ले जाया जा रहा है ,सन १९९३ -९४ से देश में ट्रेक्टर का दौर चला जिसके साथ साथ एक दौर और चालू हो गया वो था ,किसानो की आत्महत्या का दौर |
एक ट्रेक्टर के लिए औसतन १००० से १२०० घंटे का कार्य हो तो ट्रेक्टर लाभदायक माना जाता है ,फिर भी हमें कम से कम ४०० से ५०० घंटे का कार्य भी हो तो ले सकते है ,अभी हमारे देश में सरकार , बैंक और ट्रेक्टर कम्पनी अपनी आमदनी बढाने के लिए किसानो के गले में फासी का फंदा डाल रही है ,इसलिए बहुत छोटे अमाउंट के साथ ट्रेक्टर देकर बैंक से फाइनेंस करवा दिया जाता है जबकि यह नहीं देखा जाता है की किसान की आवश्यकता है या नहीं ,आज देश में हर साल ६ लाख से ज्यदा ट्रेक्टर बिकते है जिसमे से अधिकतर ट्रेक्टर छोटे किसान और बाकि पुराने को बदलकर ने स्कीम में नया लेने का दौर जारी है |
क्या ट्रेक्टर खरीदने के पहले इसके अर्थशात्र को समझया या समझने की किसान ने कौशिश की है ,आज के समय ६ लाख का ट्रेक्टर ,२ लाख की ट्रोली और १.५ लाख का सीडरील आती है  जो की कुल मिलकर १० लाख के होते है |
यदि एक किसान ने १० लाख का सामान व्याज पर लेता है साल में उसे १ लाख से १.२० लाख तक का व्याज देना और दूसरा १० % की दर से मशीन का घिसावत या भाव कम होना तो कुल मिलकर किसान १ लाख का प्रतिवर्ष घिसावत साथ ही साथ करीब ५० हजार  का रखरखाव और डीजल आदि का खर्च होता है |
सब खर्चो को जोड़े तो २.५ से २.८ लाख रूपये का एक ट्रेक्टर उधार खरीदने में खर्च आता है बाकी आपके १० लाख तो अलग से है ही ,इसलिए जिन जिन छोटे किसानो ने ट्रेक्टर लिए है वो १० साल खेती सिर्फ बैंक और ट्रेक्टर कम्पनी के लिए करते है उस बिच कभी फसल ख़राब हो गई तो समझो कोई रास्ता नहीं है |
जबकि एक छोटा किसान ट्रेक्टर खरीदने की बजाय गाँव के किसी किसान जिसके पास ट्रेक्टर है उसको ५० हजार से १ लाख में पूरा खेत का कार्य करवा सकता है दूसरा उस ट्रेक्टर वाले किसानो को अलग से कार्य मिल जाता है जिससे वह अपना खर्च निकल सकता है |
इसलिए ट्रेक्टर के नाम पर मशीनीकर न नहीं किसानो को कर्ज के मुह में धकेला जा रहा है |
इसलिए ट्रेक्टर खरीदने के पहले सोच और सरकार ने तुरंत इस पर अपनी निति तय करना चाहिए जिस किसान के पास ७० % रकम नहीं है उसे ट्रेक्टर नहीं दिया जाना चाहिए

प्रोफेसर चरणजीत सिंह चौधरी, दातारामगढ़ राड़ की ढाणी की कलम से।

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