राजस्थान सरकार शिक्षा और चिकित्सा में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है | उच्चशिक्षा का पूर्णत: निजीकरण करने में लगी हुई है | निजी महाविद्यालयों में न तो स्टाफ है और संसाधन | अयोग्य शिक्षकों के दम पर ये निजी महाविद्यालय चल रहे हैं | पुस्तकालय और खेल के मैदान नहीं हैं | प्रयोगशालाओं का यहां नितांत अभाव है | हर वर्ष बिना निरीक्षण इन महाविद्यालयों की मान्यता बढ़ा दी जाती है | जांच दल बंद लिफाफे लेकर मान्यता प्रदान कर देता है | कई महाविद्यालय ऐसे है जहां एक भी शिक्षक योग्यता नहीं रखता है | अधिकांश महाविद्यालयों के निदेशक(तथाकथित शिक्षाविद् ) ही महाविद्यालय के प्राचार्य है | यह अलग बात है कि उनमें ज्यादातर को महाविद्यालय की चोखट तक जाने का सौभाग्य नहीं मिला। 
पुस्तकालय, प्रयोगशालाओं व योग्य शिक्षकों के अभाव के बावजूद इनको मान्यता कैसे मिल जाती है? इसके विस्तार में जाने की ज़रूरत है | जब इन कॉलेजों के मान्यता की बात आती है तो सबसे पहले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व राजकीय महाविद्यालयों के प्राचार्य व शिक्षकों को जांचदल के रूप में भेजा जाता है | ये शिक्षक चांदी के चंद सिक्कों में अपना ईमान बेच देते हैं | वे फ़र्जी शिक्षकों पर आपत्ती नहीं कर अपनी सहमती जता देते हैं | आभासी प्रयोगशाला व कागज़ी पुस्तकालय पर अपनी मोहर लगाते हैं | 
विश्वविद्यालय परीक्षा आवेदन पत्र भरते समय विद्यार्थियों से तय फीस से अधिक राशि ग्रहण की जाती है | प्राय: किसान,मज़दूर,कामगारों के लड़के इन निजी महाविद्यालय में प्रवेश लेते हैं | हाड़तोड़मेहनत से प्राप्त धन का इन महाविद्यालय के शोषक संचालक बिना प्रयास किए दुरुपयोग करते हैं | 
इन सब के लिए भाजपा सरकार दोषी है | उसने एक-दो कक्ष में बीएड और डिग्री कॉलेज की अनुमती देकर प्रदेश की उच्चशिक्षा का भट्टा बैठा दिया | 
मैं अभी नेपाल से लौटा हूं | मैंने वहां पाया कि एक को छोड़कर सभी विश्वविद्यालय सरकारी है | एक पीपीपी मोड़ पर हैं | जब एक छोटा सा राष्ट्र शिक्षा पर इतना धन खर्च कर रहा है तो भारत पीछे क्यों है ? मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे नेे अपने चुनावी घोषणा पत्र में प्रत्येक खंड स्तर पर सरकारी महाविद्यालय खोलने की बात की थी | तीन साल की अवधि में ये महाविद्यालय नहीं खोले गए | चुनाव के समय राजनीतिक दल बड़ी-बड़ी घोषणाएं करते हैं। इन घोषणाएं के आधार पर राजनीतिक दल जनता का बहुमत और समर्थन प्राप्त कर सरकार बनाते हैं । किन्तु वे उन घोषणाओं को अपने कार्यकाल तक पुरा नहीं कर पाते हैं । आज़ादी के 70 साल बीत चुके हैं किन्तु किसी भी दल ने अपनी घोषणाएं अभी तक पूरी नहीं की। निर्वाचन आयोग को चाहिए कि चुनावी घोषणा पूरी न करने वाले दल की मान्यता ख़त्म करें | किसी भी दल का जीतकर सत्ता में आने का आधार उसका घोषणा पत्र है |
मैं दांतारामगढ़ क्षेत्र से हूं, वहां आज़ादी के ७० साल बाद भी राजकीय महाविद्यालय नहीं खोला गया | विगत वर्ष पं श्रीराम शर्मा खाचरियावास के नेतृत्त्व में क्षेत्र में सरकारी कॉलेज खोलने की मांग को लेकर किसान नेता हनुमान परसवाल व अनेक गण्य मान्य लोगों ने उपखण्ड अधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया | एक साल बीत जाने के बाद भी न तो कॉलेज के लिए भूखण्ड देखा गया और न सरकार ने इच्छा प्रकट की | युग द्रष्टा, स्वनामधन्य ,राजर्षि दांता ठाकुर मदन सिंह के अलावा यहां कोई दबंग और जुझारू विधायक नहीं बना | 
यद्यपि इस क्षेत्र से कई दिग्गज नेता जीतकर देश व राज्य के शीर्ष पदों पर पहुंचे यथा स्वर्गीय भैंरो सिंह शेखावत,नारायण सिंह,अजय चौटाला,अमरा राम आदि |
सरकार की गलत शिक्षा नीति के चलते प्रदेश का शैक्षणिक माहौल बिगड़ रहा है | समय रहते हुए हम नहीं जगे तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा -
समर शेष है नहीं काल का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध |
राजेन्द्र मधुकर



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