राजस्थान के मरुस्थल का प्रवेश द्वार सीकर है। सीकर शेखावाटी का हृदय स्थल है। यहीं से मरुस्थल प्रारंभ हो जाता है। सीकर जनपद मुख्यालय से ईसान कोण में 36 किलोमीटर दूर अरावली पर्वतमाला की उपत्यका में स्थित चारों ओर से पहाड़ो से घिरा हुआ शाकंभरी माता का मंदिर बरसों से यहां के आस्था का केन्द्र रहा है | शाकंभरी जाने के दो मार्ग है : एक उदयपुरवाटी से व दूसरा गोरिया से। सीकर से गोरिया मार्ग से होते हुए आप शाकंभरी पहुँच सकते हैं । सीकर से २३ किलोमीटर बाद विशालकाय तथा सर्पिलाकार पहाड़ो को काटकर इस मंदिर तक जाने का रास्ता बनाया गया है | शोभावती गंगा (भाद्रपद मास में यहां मेला लगता है ) से ही पहाड़ प्रारंभ हो जाते हैं | नदी ,टीले और पहाड़ों का त्रिवेणी संगम यहां देखने को मिलता है | जल दोहन के कारण बारह मासी नदी शोभावती अब सूख गयी है | पहले यह बलखाती नदी इठलाती हुई अपने प्रिय सागर से मिलने के लिए रैवासा तक पहुंच जाती थी | अतिक्रमण के कारण नदी का चौड़ा पाट अब सिकुड़ गया है | यह कृशांगी बन गयी है | मनुष्य के लालच ने जल, जंगल और ज़मीन की नैसर्गिकता को ख़त्म कर दिया।
पलास वृक्ष नदी के किनारे खड़े ऐसे लग रहे हैं मानो वे गंगा की आरती उतार रहे हैं | पहली बार मैं अपने मित्र श्रीराज कुमार सेठी के साथ इस नदी पर स्थित गंगा माता के मंदिर में दर्शनार्थ गया | उस वक्त की हरीतिमा को देख मैं मुग्ध हो गया | श्री सेठी परम धार्मिक है ,उन्होंने नदी स्नान के लिए आग्रह किया | यद्यपि बहुत ज्यादा लोगों द्वारा स्नान किए हुए जल में स्नान करने की मेरी इच्छा नहीं थी किन्तु उनका आग्रह टाल न सका | स्नान करते ही पूरे शरीर में स्फूर्ति आ गयी |
यात्रा के आगे का पड़ाव खाकी अखाड़ा है | यहां से आगे बढ़ेंगे तोे आपको वामभाग में एक पहाड़ी पर टपकेश्वर का मंदिर दिखाए देगा | पानी टपकने के कारण शिव टपकेश्वर महादेव हो गए | यहाँ आज भी अनवरत झरना बहता है | यहां घने कुंज हैं | एक बार आलोक पटेल के साथ मैं एक गोठ में सम्मिलित हुआ | गोष्ठी(जहां गाएं बैठकर जुगाली कर रंभाती है )शब्द से गोठ बना है | आज भी सरकारी अमला भोजनकर बौद्धिक जुगाली ही करता है |
भगोवा की घाटी को पार कर आप शाकंभरी दर्शन कर सकते हैं | इस घाटी में विभिन्न प्रकार के पेड़ लगे हुए है। इन पहाड़ो पर बैर और डांसरया(सूक्ष्म फल) पर्याप्त मात्रा में मिलेंगे | यहाँ पर बैर की झाड़ियाँ पर्याप्त मात्रा में हैं। डांसरिया और बैर तोड़कर यहाँ के लोग समीप के बाज़ार में विक्रय के लिए ले जाते हैं। पथिक जितने चाहे उतने बैर खा सकते हैं। यहाँ पर कोई रोक टोक नहीं हैं। घाटी को पार कर आप शीर्ष पहुँचेंगे तो
वहाँ शीतल मंद बयार से हृदय आह्लादित हो जाएगा। यहाँ से घुमावदार मार्ग से होते हुए सकराय पहुँचेंगे। मंदिर परिसर में प्रवेश से पूर्व आपको बायीं तरफ आम्र-उद्यान दिखाई देगा। स्वागत द्वार पर खजूरों के विशालकाय पेड़ आपका स्वागत करेंगे। यहाँ आम्र, खजूर और जामुन के पेड़ पर्याप्त मात्रा में है। कहते है कि एक बार इस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा जिससे यहां के वासी अन्न के अभाव में भयंकर संकट में आ गए | यहां माता ने दु:खी जनता के कष्टों के निवारण के लिए शाकंभरी के रूप में अवतार लिया | शाक-पात से लोगों का भरण पोषण करने के कारण माता का नाम शाकंभरी पड़ा
कई कोश में फैसले पहाड़ों में अनेक जंगली जानवरों यथा शेर, सियार,लोमड़ी को देखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्र गुर्जर बाहुल्य है। गुर्जरों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है। भेड़ और बकरियाँ अधिक पालते हैं। सकराय में ब्राह्मण, माली, गुर्जर, व अनुसूचित जाति के लोग अधिक है। लगभग लोगों के पास आम के बगीचे हैं। वसंत ऋतु में आम्र मंजरियों पर भ्रमरों का गान सुना जा सकता है। फलों के राजा आम की महक को पाकर आप प्रफुल्लित हो जाएंगे।
मंदिर के बाहर लगा एक शिलालेख लगा हुआ है | हिन्दी से पहले की लिपि होने के कारण मैं इसको पढ़ नहीं सका | हिन्दी का आविर्भाव १०५० मानते है | मंदिर के गर्भ गृह में तीन मूर्तियाँ लगी हुई है। तीनों ही दुर्गा का रूप है। मंदिर एक परकोटा से घिरा हुआ है। मंदिर पर सुंदर कंगूरे लगे हैं। मुख्य द्वार पर झालरदार नक्काशी देख कर आप अभिभूत हो जाएंगे। ।योगिनियों के नृत्य करते हुए के चित्र यहाँ बने हुए है। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो शेरों की मूर्तियाँ लगी है। शेर शक्ति का पर्याय है और दुर्गा का वाहन भी। पास में एक धूणा है जहाँ अनवरत अग्नि प्रज्वलित रहती है। लकड़ी के जलने सेे धुँआ का निकलना स्वाभाविक है। अतः धुँआ के कारण ही धूणा शब्द बना। यहाँ आभीर जाति में उत्पन्न महंत गद्दीनशीन है। ये महंत घुड़साल रखते हैं और घुड़सवारी का शौक रखते हैं। पास में एक गोशाला भी है।




राजस्थान में आदिकाल से ही शक्ति की उपासना होती रही है। यहाँ की मूर्तियाँ देख प्रतीत होता है उस काल खण्ड के शासक शक्ति के उपासक रहे हैं। लिपि को देखकर लगता है यह मंदिर लगभग १००० साल पहले अस्तित्व में रहा होगा | मंदिर के बाहर शिव की काले पत्थर की मूर्ति को देखकर लगता है कि यह १००० साल पहले की है | पास के शिवालय में शिव के पास गणेश है तथा सामने नंदी की मूर्ति है | मगर पार्वती व कार्तिकेय की मूर्ति का न होना मेरे लिए जिज्ञासा व इतिहासकारों क लिए शोध का विषय है | पास में तीन कुण्ड है जो अब सूख गए हैं | गर्म पानी व ठंडेपानी के दोनों कुण्ड सूख चुके हैं | मुझे यहां करीब बीस साल पहले स्नान का अवसर प्राप्त हुआ | यहां रावण कुण्ड,मंदोदरी कुण्ड व नाग कुण्ड दर्शनीय है |
नवरात्र में यहां मेला भरता है | यहां भारत वर्ष से हज़ारों श्रद्धालुओं का आना-पाना लगा रहता है | प्रवासी भारतीय यहाँ जात-जड़ूला (चूडाकरण संस्कार) हेतु आते है। खंडेलवाल वैश्य जाति शाकंभरी को अपनी कुल देवी मानते हैं। अभिनेता अजय देवगन,मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान,दिग्गविजय सिंह, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, राजस्थान के कद्दावर नेता घनश्याम तिवाड़ी सहित अनेक नामचीन नेता,अभिनेता व न्यायाधीश व योग गुरु बाब राम देव यहाँ आकर दर्शन कर चुके हैं। रात्रि विश्राम के लिए यहां सामान्य श्रेणी व वातानुकूलित धर्मशालाएं बनायी गयी हैं |भोजन की व्यवस्था भी समीचीन है | आपाधापी से निजात पाकर एक रात यहां रुककर प्रकृति का आनंद लीजिए |

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