कुछ समय पहले रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के ऊपर सियासत का बाज़ार गर्म था हर कोई यह कह रहा था कि कांग्रेस के कार्यकाल में स्थापित रघुराम राजन एक बेहतरीन इंसान थे और उनका देश से बाहर जाना देश के लिए क्षति है। इस पूरी सियासत में पूरी देश की अर्थव्यवस्था की गोपनीयता ताक पर रखकर पुराने सरकार के निर्णय बेहद चौंकाने वाले थे। 
✅रिज़र्व बैंक गवर्नर देश के बाहर क्यों जा पाता है
रिज़र्व बैंक कोई छोटी मोटी संस्थान नहीं है बल्कि वहाँ पूरे देश की सभी आर्थिक गोपनीय नीतियाँ बनती हैं जो कई सालों से चलती आ रही हैं और उनकी बाहर जाने का या ख़ुलासा होने का लंबा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति जो रिज़र्व बैंक का एक बार गवर्नर बन जाता है और जिसके हाथ में पूरे देश की अतिसंवेदनशील आर्थिक जानकारियां लग जाती है ऐसे व्यक्ति को वापस देश से बाहर जाने देना कितनी बड़ी चूक है। 
✅पिछली सरकारों ने नहीं रखी कोई शर्त, अब कि सरकार का भी कुछ पता नहीं
इतने बड़े पदों पर बैठाने से पहले उस पद के लिए इस शर्त को न रखना कि कार्यकाल ख़त्म होने के बाद आप देश से बाहर जाकर नहीं रहेंगे जैसा कोई क़ानून या शर्त रिज़र्व बैंक के गवर्नर बनने के आगे शामिल नहीं थी। पिछली सरकार में जहाँ इस प्रकार का कोई क़ानून नहीं बनाया वहीं इस सरकार ने भी इस प्रकार की कोई शर्त अभी तक रखी है या नहीं इस बारे में कोई दस्तावेज़ मौजूद नहीं है। मगर रघुराम राजन का जहाँ पहले से ही पता था कि वो कार्यकाल ख़त्म होने के बाद वापस विदेशों में जाकर नौकरी करेंगे वहाँ उन्हें इतनी बड़ी संवेदनशील जगह देना कई सवाल खड़े करता है जिसके जवाब आम नागरिक को जानने का हक़ है। 
✅रघुराम के कार्यकाल में नहीं बल्कि मीडिया ने उन्हें हीरो बना दिया था
रिज़र्व बैंक अपने उसूलों से चलता है और स्थापित क़ानून के दायरे में रह कर कार्यकर्ता है ऐसे में रघुराम से पहले वाले गवर्नर भी बेहद कुशल कार्यप्रणाली के धनी थे और उन्हें किसी भी प्रकार से रघुराम से कम करके आंकना सिर्फ़ उनका ही नहीं अपितु पूरे देश का अपमान है। आज से चार साल पाँच साल पहले अमरीकी करण देश पर हावी था और हर उत्पाद जिस पर अमरीका का नाम लगा होता था या सेवा जो अमरीकी होती थी या अंग्रेज़ी होती थी उसे ऊपरी दर्जे पर रखा जा करता था। मीडिया समूह की ज़्यादातर भागीदारी ऐसे मालिकों के पास थी जिन पर विदेशों से मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं मगर पिछले कुछ सालों में तस्वीर उतार कि उदार हो गई है और इसलिए देश के हर किसी व्यवस्था में हर कोई खोट निकाल रहा है। यह ज़्यादा समय फट नहीं चलेगी और जल्द ही विदेशी शेयर वाले चैनल हथियार डाल देंगे। 
✅राजीव गांधी बिना विदेशी दबाव के निर्णय लेते थे जैसे अब मोदी लेते हैं
कई क्रांतिकारी विचारक ये मानते हैं कि अंग्रेज़ देश को तो छोड़कर चले गए थे मगर पूरे तौर पर राजीव गांधी के समय ही देश ने सर उठाकर अपने निर्णय बिना किसी दबाव में लेने शुरू किये थे। राजीव गांधी की हत्या सेदेश दस साल पीछे चले गया था मगर उनकी हत्या के बाद जिस प्रकार स्थिति डांवाडोल रही उस प्रकार ये 10 साल की जगह कई गुना लंबा समय हो गया और अब ऐसा लगता है कि मोदी के आने के बाद भारत दोबारा से अपने फ़ैसले पुरे तौर पर ख़ुद ले पा रहा है। इसके चलते मोदी के सुरक्षा कर्मियों को भी उनकी सुरक्षा के लिए ख़ासी मेहनत करनी पड़ रही है। ऊपरवाला ना करें कोई अनहोनी हो जाए तो देश दोबारा से अनिश्चित काल के लिए अधर में न लटक जाए
✅रघुराजन का जाना देश हित में है
अगर रघु राजन को वापस विदेश ही जाना था तो जितना जल्दी उन्हें भेज दिया गया उतना ही देश के लिए हितकारी रहा। देश के सर्वोच्च संस्थान में कार्यरत किसी भी सीनियर स्टाफ़ के आगे यह शर्त रहनी चाहिए कि अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद वो देश में ही रहेंगे जैसा अमेरिका और ब्रिटेन में शर्तें रहती है। 



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