जयपुर : सीकर विधानसभा सीट पर दोनों पार्टियों ने अपने अपने उम्मीदवार ब्राह्मण उतार दिए हैं जिसके चलते ब्राह्मण वोट बंट गया है और जीत निर्धारण में उनकी कोई ख़ास भूमिका नहीं रहने वाली | जहाँ  जहाँ भी एक ही जाति या एक से प्रोफाइल के दो कैंडिडेट आमने सामने खड़े हो जाते हैं वहां जीत का निर्धारण उनके समाजों के हाथों में नहीं रह जाता

माली कुमावत परंपरागत भाजपा की तरफ झुकाव रखते हैं 

सीकर के माली और कुमावत समाज परंपरागत रूप से भाजपा की तरफ झुकाव रखते हैं और उनके नेताओं की माने तो अस्सी प्रतिशत से ज्यादा भाजपा को ही वोट देते हैं

मुस्लिम परंपरागत व जाट अक्सर कांग्रेसी उम्मीदवार को पसंद करते हैं 

गावों में चले जाएँ और किसी भी किसान से पूछें तो उसे कांग्रेस के उम्मीदवार और नीतियों के बारे में सब पता रहता है साथ ही ऐसा बहुत  कम देखने को मिलता है कि वसुंधरा राजे की कोई बड़ाई करता मिले इसका कारन  भाजपा से नाराज़गी नहीं बल्कि विरोधियों द्वारा वसुंधरा की इमेज जो महिला के रूप में बना दी गई है ज्यादा जिम्मेदार है

जाट वोट सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक माना जाता है 

दलबदलू  और लोकतांत्रिक में से एक को नकारात्मत व एक को सकारात्मक शब्द माना जाता है मगर ये दोनों शब्द एक ही हैं, जो पार्टी नहीं बदलते या गलत नीतियों से परेशान होने के बाद भी अपने वोट को एक की ही झोली में डालते रहते हैं वो लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकते, इस क्रम में जाट वोटर हर बार सीकर ही नहीं पूरे प्रदेश में कभी किसीकी और कभी किसीकी सरकार बनाता बिगाड़ता रहता है जो लोकतंत्र के लिए बेहद जरुरी है |

नाराज़ ब्राह्मण और इंतज़ार करते जाट वोटर किस करवट बैठेंगे 

दरियाँ बिछाने वाले कई कार्यकर्ता समय के साथ उम्मीदवारी पर हमेशा नज़रअंदाज़ी से नाराज़ रहते हैं मगर उनके पास कोई विकल्प नहीं रहता इसलिए उनको हर बार मन मसोस के रहना पड़ता है मगर इस बार चुनाव में कई मुद्दे ऐसे आ गए हैं जो कम से कम पांच से आठ प्रतिशत का खेल खेल जाएंगे जिनको हवा देने का काम हनुमान बेनीवाल का तीसरा मोर्चा दे रहा है, जो किसी भी रूल से बंधा हुआ नहीं है और जो मिले उससे काम चलाने का काम कर रहा है

तीसरा मोर्चा का जाट उम्मीदवार खेल बदल सकता है 


ऐसे तो जहाँ भी दोनों पार्टियों के कैंडिडेट एक ही समाज से होने पर अलग अलग समाजों को पार्टी ने नाम पर साधने में लग जाते थे और उनके खिलाफ कई निर्दलीय कैंडिडेट अन्य समाज के होने पर भी उनकी सेहत हो कोई फरक नहीं पड़ता था मगर इस बार तीसरा मोर्चा की बड़ी बड़ी रैलियों ने मतदाता का ध्यान आकर्षित किया है कई दरिया बिछाने वाले डेडिकेटेड कार्यकर्ता अपने आप को लोकतांत्रिक खेल में शामिल करने  का मन बना चुके हैं |

ताराचंद धायल के समर्थन में महेश शर्मा की बगावत 

ताराचंद धायल ऐसे उम्मीदवार हैं जिनकी परिषद् में कई बार सीटें बदली गई और हमेशा मुश्किल सीट पर उन्हें भेजा गया मगर हर जगह वो रिकॉर्ड मतों से जीते, हाल ही में तो वो इतने वोटों से जीते हुए हैं जितने से कई विधायक भी नहीं जीते होंगे उनके ऊपर महेश शर्मा का विशेष स्नेह है और जिसके चलते वो धायल को सीट दिलवाने की पुरज़ोर कोशिश में लगे हुए थे| सोशल मीडिया पर भी धायल के आस पास भी एरिया का कोई नेता नहीं था मगर चुनाव के लिए लोकप्रियता के अलावा फण्ड की भी आवश्यकता होती है जो धायल के पास नहीं है इसके चलते जलधारी का पलड़ा भरी पड़ा

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