जो लोग बार बार आकर अपनी नामर्दी दिखाते हुए केवल कमजोरों पर अत्याचार, कमेंट में गाली देने की कोशिश करते हैं उनके घर के आदर्श कितने विरल हैं आराम से समझा जा सकता है

कमज़ोर के लिए खून बहाना याद भी है और गर्व भी है 

पैसे वालों की चाटुकारिता के लिए समाज की राजनीती करने वाले हर जगह उचक उचक कर पहुँच जाते हैं मगर कमज़ोर के लिए आवाज़ उठाने का दम केवल कुछ में ही होता है | समय समय पर सीकर टाइम्स की बेबाक, निर्भीक पत्रकारिता के जरिये कड़वे सच लिखे जाते हैं जिसको निगल पाना कायरों के बस की बात ही नहीं और ऐसे लोग बार बार हॉस्पिटल, ढाका, पिटाई आदि लिखते हैं ये वही कायर हैं जिनके ऊपर खुद पर बीतेगी तो सबसे पहले ये सीकर टाइम्स को ही मैसेज करेंगे 

सरदारों को भी ऐसे ही कायरों द्वारा 12 बजे के लिए ताना दिया जाता रहा है 

कई लोग जिनकी बहिन बेटियों की इज़्ज़त की रक्षा के लिए सरदारों ने आधी रात से बारी बारी ड्यूटी लगा रखी थी उनकी ड्यूटी का लोग हमेशा इंतज़ार किया करते थे की 12 बज गए सरदारजी अब हमारी रक्षा करने आ जाओ जो धीरे धीरे मजाक में बदल दी गई ऐसे ही डॉ यशवंत जिन्हे पूरा गर्व है कि जितना साधारण पत्रकार अपनी जिंदगी में कमज़ोरों की आवाज़ नहीं उठा पाता उतनी जबरदस्त शेरदिल पत्रकारिता और जनहित के असली मुद्दे उठाने में पूरे जिले ही नहीं राज्य के पत्रकारों से भी ऊपर नाम हो गया जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली

हमें गर्व है मगर नामर्द इसको नहीं समझेंगे 

देश और समाज के लिए खून बहाना क्या होता है इसका पता उन्हें ही होता है जिनको जान की परवाह नहीं होती और किसी बलशाली नेता की छांया के पीछे छिपकर कीड़े मकोड़ों की तरह जिंदगी नहीं गुज़ारते | केवल सीकर के ही नहीं देश के इतने बड़े घोटाले जिनका राष्ट्र की नीतियों पर गहरा प्रभाव पड़ा है ऐसों के बाद एक पत्रकार इतने रिस्क में रहता है जितना बॉर्डर पर तैनात सैनिक मगर इसको समझने के लिए दिलेरी और परिवार में हासिल किये हुए संस्कार चाहिए

सबसे पहला फोन करनी सेना से आया था मदद का 

सामाजिक संगठन केवल भय और द्वेष नहीं फैलाते, वो हर कमज़ोर के साथ होते हैं ऐसा नहीं होता तो डॉ यशवंत चौधरी पर हमले के बाद किसी भी जाट संस्था का नहीं बल्कि सबसे पहला फोन राष्ट्रीय करनी सेना का आया था और विश्वास दिलाया था समाज के हर अत्याचार के खिलाफ वो खड़े हैं, केवल अलग जाति से होने की वजह से वो साथ देने में पीछे नहीं हटेंगे मगर डॉ यशवंत की ही जाति का कोई भी सामाजिक संगठन साथ देने के बजाय मामले को पैसे वाले के हक़ में निबटाने और पैसा बनाने की कोशिश कर रहा था| फुले ब्रिगेड ने भी जी जान लगा दी थी न्याय दिलाने के लिए |



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