गिरिराज सिंह लोटवाडा: भारत विश्व का सबसे युवा देश है लेकिन युवा वर्ग वर्तमान शासन-प्रषासन  में व्याप्त  संवेदनहीनता, अनैतिक-स्वार्थपूर्ण आचरण, असहिष्णुता के कारण बहुत व्यथित, आक्रोषित-अधीर, होकर अराजकता के पथ पर अग्रसर होनें के लिए विवश हो गया है जिससे हमारी प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली के भविष्य के लिए गम्भीर संकट/चुनौती उत्पन्न हो गई है। सत्ताधारी व विपक्षी दलों में अपनी कुर्षी एवं निजी-दलीय हितों के चिन्तन व सुरक्षा के अतिरिक्त किसी भी अन्य विषय में कोई रूचि प्रतीत नहीं होती है जो कि संपूर्ण देषवासियों के लिए बहुत चिन्तनीय यक्ष प्रश्न बन चुका है।इस गम्भीर राष्ट्रीय समस्या पर ध्यान देना जरूरी है।



सरकार ने केवल शिक्षा व स्वास्थ्य आदि ही नहीं बल्कि अपने सभी कार्यों को ठेका प्रणाली के माध्यम से संचालित करके खुला व्यापार बना दिया है। आज शिक्षा के किसी भी संकाय में पढाई का कोई स्तर नहीं है प्राईवेट शिक्षण संस्थायें कुकुरमुत्तों की तरह गली गली में खुली हुई है जिनमें फीस तो भारी भरकम ली जाती है लेकिन सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होनें से शिक्षण बहुत निम्न स्तर का होता है। पढाई के बाद युवा वर्ग रोजगार के लिए दर दर की ठोकरें खाकर कुण्ठित हो रहा है, मां बाप परेषान हैं देश में हा हा कार मचा हुआ है लेकिन राजनैतिक दल केवल लोक लुभावनें सुनहरे सपनें दिखा कर या एक दूसरे को जिम्मेदार बता कर चुनाव दर चुनाव युवाओं के साथ धोखा करती रही है आज तक उनका हर प्रकार से शोषण किया गया है। आम युवा बहुत निराश, हताश, आंदोलित है और यही हताशा युवा वर्ग को नक्सलवाद, आतंकवाद और अराजकता के मार्ग पर धकेल रही है। नक्सलवाद का रेड कार्नर एरिया दिन प्रति दिन बढता जा रहा है जिसका मौजूदा सरकारों के पास कोई हल नहीं है या उन्हें अपने स्वार्थों के अलावा इसे सुलझानें में कोई रूचि ही नहीं है। नक्सलवादी समानान्तर सरकारें चला रहे हैं भूमि आवंटन और पट्टे दे रही है और उनके सामनें सरकारें विवश दिखाई दे रही है। यह अराजकता की स्थिति प्रजातंत्र के लिए बहुत बडा खतरा है लेकिन सभी राजनेता इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। अतः सभी सरकारों, दलों, मीडिया को देशहित में युवा वर्ग की समस्याओं का निवारण करनें की दिषा में कार्य करना चाहिये वरना देश का विघटन हो जायेगा।

आज किसी भी जाति, धर्म या जनता के वर्ग-समुदाय की चाहे किसान हो, व्यापारी हो, मजदूर हो, नौकरी पेशा हो, उनकी किसी भी प्रकार की मांग या समस्या होती है जो सरकार के सम्मुख नियमानुसार प्रक्रिया - ज्ञापन - डेपूटेशन के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है उसे गम्भीरता से नहीं लिया जाता और गोलमाल भ्रामक ढंग से जबाब देकर टालनें की कौशिश की जाती है। प्रशासन और नौकरशाह भी सरकार की मंशा के अनुरूप कार्य करते हैं और वे भी (अपवादों को छोड दीजिये) किसी भी नियम कानून को आधार बना कर काम को लटकानें में ही ज्यादा रूचि रखते हैं (बशर्ते उनका निजी लाभ न हो)। सत्ताधारियों ने देश में आज तक नौकरशाही के कार्य का पैमाना ;ूवता बनसजनतमद्ध नहीं बनाया, ईमानदार प्रताडित किये गये और चाटूकार व भ्रष्ट को सब सहुलियतें व काम नहीं करनें के लिए एक तरह से स्वतंत्रता मिली होती है

सरकारें शांतिपूर्ण आंदोलनों को गम्भीरता से नहीं लेती। परिणामतः ऐसे आंदोलन जब उग्र व हिंसक रूप लेते हैं तब सरकार बल प्रयोग कर उसे कुचलनें की कोशिश करती है जिसमें जन धन की हानि होती है और कई बेकसूर लोगों को मुकदमों में फंसा कर दमन की कार्रवाई करती है। इनमें भी युवा वर्ग को फंसा कर उनके भविष्य के साथ खिलवाड किया जाता है। 

उक्त परिदृष्य में युवा वर्ग, किसान, छोटे व्यापारी, दिहाडी मजदूर, व आम गरीब तबका आज बहुत ही त्रस्त और परेशान है और उनका प्रजातांत्रिक व्यवस्था से मोह भंग हो रहा है। अधिकांश तथाकथित जनप्रतिनिधि (आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त) सेवा के नाम पर देश को दिन दहाडे लूटते दिखाई देते हैं और जनता बेबसी से खून के आंसू पीती हुई टुकुर टुकुर देखती रह जाती है लेकिन अन्दर ही अन्दर खून खौल रहा होता है। अतः सभी सरकारों, राजनेताओं, दलों और संबंधित पक्षों को आमजन की मूल समस्याओं जैसे रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की व्यवस्था व ईमानदार पारदर्शी अपेक्षित अच्छा आचरण अपनाना होगा अन्यथा वो दिन दूर नहीं है जब यही युवाजन और आम जनता उक्त नेताओं को सडकों पर दौडा दौडा कर सरेआम जूते मारेगी और देश में अराजकता और अफरा तफरी की स्थिति उत्पन्न हो जाऐगी।
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’ अध्यक्ष, श्री राजपूत सभा

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