सीकर: बस केवल कुछ ही दिन बचे हैं आदर्श आचार संहिता लगने में मगर उससे पहले सभी विशेषज्ञ लगे हुए हैं अपनी अपनी राय देने में, जिसमें कोई ज़िले में पुरे तौर पर कांग्रेस को स्थापित मान रहा है और कोई भाजपा को भी तगड़ी स्थिति में दिखा रहा है मगर इन सभी सर्वे और रायों में जो सबसे बड़ी स्थिति शामिल नहीं है वो हनुमान बेनीवाल द्वारा तैयार किया गया जनाधार। 
मई में हुई हनुमान बेनीवाल की हुंकार रैली का असर
जब मई के दौरान हनुमान बेनीवाल ने सीकर में हुंकार रैली की थी उस समय आयी गई भीड़ से कई लोग हनुमान बेनीवाल की  लोकप्रियता का अंदाज़ा लगा रहे थे मगर साथ ही ऐसे भी लोग थे जो दावा कर रहे थे कि बेनीवाल इतना लोकप्रिय नहीं हैं जितने अन्य नेता लोकप्रिय हैं मगर उसके बाद हमने सचिन पायलट का कार्यक्रम भी देखा और हाल ही में आयी वसुंधरा राजे की भीड़ भी देखी जो किसी भी प्रकार से हुंकार रैली के आस पास भी नहीं दिखाई दी। इसलिए हनुमान बेनीवाल को आंकलन में नहीं शामिल करना सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है
दांतारामगढ़ में कांग्रेस के पास चेहरे की कमी
नारायण सिंह दशकों से दांता रामगढ़ के पसंदीदा चेहरे रहे हैं और कांग्रेस का मज़बूत स्तंभ भी रहे हैं मगर उनके बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में जनता के बीच में उनके बेटे को उस प्रकार लोकप्रियता फ़िलहाल नहीं प्राप्त है जितने उनके सामने चुनौतियां है। भाजपा के हरीश कुमावत पिछले कई समय से दाँता रामगढ़ में हर छोटे बड़े कार्यक्रम में दिखाई देते हैं जिससे उनका जनाधार बन रहा है वहीं दूसरी ओर कॉमरेड अमराराम ने कई सफल आंदोलनों के बाद अपनी सशक्त इमेज बना ली है जिसके सामने कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं दिखता
नीम का थाना की जगह अन्य किसी स्थान पर बाजौर के सीट माँगने की अटकलें
अगर दावों पर यक़ीन किया जाए तो प्रेम सिंह बाजौर इस बार नीम का थाना से चुनाव लड़ने के मूड में नहीं दिख रहे और ऐसा मानने की कई वजहें भी है, पहली वजह तो प्रेम सिंह बाजौर का बढ़ता हुआ कद है जिसके चलते वो महत्वपूर्ण सीट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं साथ ही कार्यकाल पूरा बीत जाने पर भी नीम का थाना के जो मूलभूत मुद्दे थे उनकी पूर्ति के लिए सरकार ने कोई विशेष पैकेज विधानसभा क्षेत्र को नहीं दिया है जिसकी वजह से लोगों में नाराज़गी है। 
सीकर विधानसभा सीट सबसे पेचीदा है
रतन जलधारी की सभी पार्टियों के प्रतिनिधियों से अच्छे सम्बंध है मगर पूरे सत्र के दौरान उन्होंने अपने आपको स्थापित करने के लिए कोई बड़ा कारनामा नहीं करके दिखाया है। दूसरी ओर राजेन्द्र पारीक जो सीकर विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस की तरफ़ से प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं उनकी ज़बरदस्त फ़ैन फॉलोइंग है और पिछले चुनाव में उनकी हार का कारण रतन जलधारी की लोकप्रियता नहीं बल्कि तत्कालीन भ्रष्टाचार विरोधी लहर थी जिसमें कांग्रेस फंस के रह गई थी। राजेन्द्र पारीक के जितने तगड़े समर्थक हैं उतने ही तगड़े उनके विरोधी भी है जो उन्हें हटवाने के लिए किसी का भी साथ दे सकते हैं जिससे कांग्रेस को बच के रहना पड़ेगा। 
धोद में मोरदया को रहना पड़ेगा सचेत
सभी को मालूम है कि अगर कांग्रेस की सरकार आ गई और मोरदिया धोद से विधायक चुनकर जयपुर पहुँच गए तो उनका मंत्री बनना तक़रीबन तय है और उनकी यही क़द्दावर छवी के समानान्तर राज्य में लोकप्रिय नेताओं की कमी पार्टी के अन्दर से उन्हे राजनीति का शिकार बना सकती है 
जो समीकरण बिगाड़ सकता है स्थापित राजनीति की गणित
ज़िले में जितने भी स्थापित मुद्दे हैं उन सबका एक समीकरण है और उनके हिसाब से आने वाले चुनावों के बारे में तर्क वितर्क दिए जा सकते हैं मगर फिर भी जो सबसे बड़ा समीकरण बन रहा है और अभी तक जिसके तीर तरकश से नहीं निकले हैं वो है हनुमान बेनीवाल का तीसरा मोर्चा। हनुमान बेनीवाल अपनी पार्टी की घोषणा सितंबर में करने वाले थे जो अब टालकर अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में पहुँच चुकी है। जहाँ तक हमारी राय हैं वो तब तक और टालेंगे जब तक दोनों प्रमुख पार्टियां अपने अपने उम्मीदवार घोषित नहीं कर देती क्योंकि बाक़ी उम्मीदवारों को तुरंत हनुमान बेनीवाल के खेमे में पहुँचने का अवसर मिल जाएगा जैसा कि बेनीवाल ख़ुद भी चाहते होंगे। बागियों को ये भी पता होगा कि ज़िले में जाट वोट बैंक जिसमें ख़ास 18-40 साल के वोटर शामिल हैं उनका झुकाव हनुमान बेनीवाल की तरफ़ ज़बर्दस्त है। ऐसे युवा कांग्रेस-भाजपा के साथ माकपा में भी है जो बेनीवाल की पार्टी की घोषणा का इंतज़ार कर रहे हैं। प्रतिशत के हिसाब से अगर गणना की जाए तो 8-18% तक का डैमेज हनुमान बेनीवाल दोनों पार्टियों को लगा सकते हैं जिसमें कांग्रेस को ज़्यादा नुक़सान होने की उम्मीदें हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि एरिया के जाट परम्परागत रूप से कांग्रेस के प्रति झुकाव रखते आए हैं। अगर ऐसा होता है तो ज़िले में आठ में से छह सीटों पर गणित गड़बड़ा जाएगी। जो कर्मठ उम्मीदवार अभी कांग्रेस और भाजपा के चक्कर लगा रहे हैं जैसे ही उन्हें टिकट नहीं मिलेगी वैसे ही उनकी कर्मठता उन्हें कितने दिनों तक बेनिवाल के खेमे में जाने से रोक पाएगी यह देखने में महीने भर से भी कम समय बचा है। 
T-20 मैच की तरह रोमांचक रहेगा यह चुनाव
सीकर ज़िले का मतदाता बाक़ी ज़िलों की अपेक्षा में ज़्यादा राजनैतिक है और उसे पार्टियों से ज़्यादा अपने चहेते उम्मीदवार के प्रति आकर्षण ज़्यादा रहता है जिसमें जातिगत भावना सबसे बड़े मुद्दों में शुमार रहती है।  सभी जातियों को एकजुट रख पाना किसी भी राजनैतिक पार्टी के बस के बाहर की बात है इसका फ़ायदा उठाते दिखाई देगा बेनीवाल खेमा 




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