सीमा और राजनैतिक गलियारों में बोफोर्स हमेशा से चर्चित रही है, कारगिल युद्ध के समय इसका इस्तेमाल हो भी चुका है मगर जिस तरह से हालात बनते दिख रहे हैं उससे लगता है बोफोर्स का इस्तेमाल सीमा और राजनीती में होने वाला है

किसने उठाया था भ्रष्टाचार होने का संदेह 

किसी भी वेपन की कीमत होती है जिसपर उसको खरीदा जा सकता है, कोई भी ग्राहक देश या सेना हमेशा कम से कम दाम पर कोई भी सामान खरीदना चाहती है और इसलिए बोफोर्स में घोटाले की आशंका के चलते स्वीडन में ही मामला उठा जो इस प्रकार है
On 16 April 1987, a Swedish newspaper broke out a story based on a whistleblower in the Swedish police, alleging that the reputed Swedish artillery manufacturer Bofors had paid kickbacks to people in several countries, including Sweden and India, to secure a Rs 1,500-crore contract.
ये उस समय का स्वीडन के लिए सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट था जिसमें स्वीडन के अंदर से आवाज़ उठी और जांच हुई जिसमें सामने आया कि 60 करोड़ की कमीशन दी गई हो सकती है और कई रूल नज़रअंदाज़ करके छिपाये गए थे | मतलब भ्रष्टाचार होने की आवाज़ भारत में नहीं विदेशी मीडिया से उठी थी
In May 1986, a broadcast by a Swedish radio station revealed that bribes of Rs. 60 crore had been paid by Bofors to Indian politicians, members of the Congress party and bureaucrats. This was picked up by a young journalist from The Hindu, Chitra Subramaniam, who happened to be in Sweden at that time, covering another story. 

राफेल और बोफोर्स में एक ही अख़बार ने खबर में बढ़त बनायी

कमाल की बात ये है कि उसी अख़बार यानि "द हिन्दू" जिसने बोफोर्स में कांग्रेस के लिप्त होने की खबर प्रकाशित की थी उसपर ही रफाल मामले में कल चोरी किये गए दस्तावेज़ प्रकाशित करने का आरोप लगा है और कार्यवाही की जाने की बातें सामने आ रही है

सीमा के हालात और बोफोर्स 

कारगिल में बोफोर्स  का इस्तेमाल हुआ था क्यूंकि पहाड़ी क्षेत्र में हलकी होवित्जर उठाकर ले जाना आसान था और वही सबसे बढ़िया वेपन भी था मगर इसपर कोई रिपोर्ट नहीं आयी थी कि इतना महंगा वेपन जो 1917 से बनता हुआ 1986 में भारत द्वारा खरीदा गया था उसकी 1999 में क्या परफॉरमेंस थी | ऐसा लग रहा है, इसपर रिपोर्ट आ सकती है

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