राज्य में बेनीवाल और गोगामेड़ी ऐसे दो नाम हैं जिनके काम और खबर सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री की ख़बरों को भी पीछे छोड़ देती हैं मगर उनको जातिवाद से त्रस्त मीडिया प्रिंट और टीवी पर अभी तक महत्व देने से बचती रही है| बहुत ही ज्यादा होने पर छोटी मोटी कोई खबर दे दिया करती थी मगर आने वाले पांच साल में समीकरण बदलने वाले हैं

सोशल मीडिया वैसे भी नब्बे प्रतिशत तक प्रिंट और टीवी को निगल चुका है 

इस समय हर युवा और वृद्ध के हाथ में जब मोबाइल आ चूका है और सुबह के अखबार की खबर की कीमत एक घंटे में ही समाप्त हो जाती है वहीँ सोशल मीडिया पर मुद्दा कई दिनों के बाद भी अपनी पूरी रंगत लिए रहता है और इसको कण्ट्रोल कर पाना भी नामुमकिन सा है जिसके चलते सोशल मीडिया फेसबुक यूट्यूब व्हाट्सप्प और ट्विटर ने पिछले पांच साल में प्रिंट और टीवी को तकरीबन तबाह कर दिया है और अब खबरें इंटरेस्ट के भरोसे चलती है बिकाऊपन से कण्ट्रोल कर पाना बेहद मुश्किल है

प्रिंट की खबर जब सोशल मीडिया पर आती है तो उसकी औकात पता चल जाती है 

प्रिंट वाले और टीवी वाले लोग भी हज़ारों पोस्ट सोशल मीडिया पर डालते हैं मगर उनको पाठक घास तक नहीं डालते और दस बीस लाइक के बाद उबाऊ खबर दम तोड़ देती है, मीडिया हाउस के खुदके लोग तक उसको पढ़ना पसंद नहीं करते नहीं तो हज़ार बारहसौ तो मीडिया के खुदके स्टाफ वाले ही लाइक कर देते ऐसे में प्रिंट में छपने वाली बेहद नीरस और बिना काम की खबर पर कोई गलती में ही क्लिक कर दे तो कर दे| एक दो बड़े टीवी चैनल और मैगज़ीन अभी भी अपनी तगड़ी ख़बरों से सनसनी मचाये हुए हैं बाकि दैनिक अख़बार जितनी रीच बताता है उससे ज्यादा तो सोशल मीडिया पर नए लड़कों का पोर्टल धमाल मचा देता है

मीडिया ने केवल जाटों राजपूतों को लड़ाने का कार्य किया है 

अभी दो ही दिन पहले जयपुर ग्रामीण से राज्यवर्धन राठोड भाजपा से और कृष्णा पूनिया कांग्रेस से चुनाव लड़ने की खबर को जाटों और राजपूतों में से किसकी साख बचेगी कहकर आदतन गलत खबर देने वाला अख़बार दैनिक भास्कर का जातिवादी एडिटर प्रस्तुत करता है वहीँ एडिटर की जाती के भी कई कैंडिडेट अलग अलग जगह से चुनाव लड़ रहे हैं और उनमें से ज्यदातरः का जमानत जब्त हो जाना भी पक्का है मगर वहां ऐसे घटिया मानसिकता वाले संपादक जो जातिवाद का जहर घोल रहे हैं पब्लिक में अपने कैंडिडेट का हार जाना अपनी जाती की इज़्ज़त का सवाल ही नहीं मानते | साफ़ तौर पर जाटों और राजपूतों को जातिवादी मीडिया ने ही उकसा उकसा कर आपस में दुश्मन बनाया है

बेनीवाल गोगामेड़ी सीधे तौर पर सवाल करते हैं और लगता है आगे भी करेंगे 

दोनों ही नेता अपने अपने समाज के लिए खासतौर पर संवेदनशील रहते हैं और ऐसा लगता है कि दोनों ही अपने अपने समाज के पत्रकारों का मीडिया में जनसँख्या के प्रतिशत के अनुसार नहीं होने पर सवाल भी खड़े करेंगे और मदद भी करेंगे अन्यथा इनको ज्यादा दिन तक जातिवादी मीडिया टिकने नहीं देगा | मीडिया में सभी जातियों का जनसँख्या के आस पास प्रतिनिधित्व नहीं होने की वजह से मीडिया पूरी की पूरी ही ऐसी बन गयी है जिसकी ख़बरों का जमीनी हकीकत से कोई लेना देना ही नहीं है,


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